मुसलमान 'वंदे मातरम्' क्यों नहीं कहते ?

यह सवाल आज भी लोगों की जुबान पर है — लेकिन अफसोस, यह सवाल अक्सर जिज्ञासा से ज़्यादा आरोप बन चुका है।

और इसी एक सवाल को "WhatsApp यूनिवर्सिटी" ने एक समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने का हथियार बना दिया है।

पर क्या वाकई जो वंदे मातरम् नहीं कहता, वो देशभक्त नहीं हो सकता?
क्या मुसलमान भारत से प्यार नहीं करते?
या क्या हमारे समझने की ज़रूरत है कि देशप्रेम का रूप अलग-अलग हो सकता है?

आइए, इन सभी पहलुओं को ठंडे दिमाग और खुले दिल से समझते हैं — बिना गुस्से, बिना डर और बिना अफवाहों के।

       



📖 1. वंदे मातरम् का मुद्दा क्या है?

"वंदे मातरम्" भारत का राष्ट्रीय गीत है। इसकी रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और यह "आनंदमठ" उपन्यास का हिस्सा है।

गीत की शुरुआती पंक्तियाँ भारत भूमि की सुंदरता और महिमा की सराहना करती हैं —
"वन्दे मातरम्, सुजलां सुफलाम्, मलयजशीतलाम्..."

मैं माँ (भारत माता) को नमन करता हूँ, जो जल से भरपूर, फलों से सम्पन्न, मलय पर्वत की शीतल हवा जैसी शीतल है। 

 यह हिस्सा आमतौर पर सभी समुदायों को स्वीकार्य है।
लेकिन आगे के छंदों में भारत भूमि को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती जैसी देवियों के रूप में पूजा जाता है:
"त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी..."

"तुम ही वास्तव में वह दुर्गा हो, जो दसों शस्त्रों को धारण करती हो।" 


यहाँ से कुछ मुसलमानों को आपत्ति होती है, क्योंकि इस्लाम में पूजा केवल एक ईश्वर (अल्लाह) की होती है।
किसी धरती, मूर्ति या इंसान की पूजा इस्लामिक मान्यताओं में शिर्क कहलाती है — और यह एक गंभीर धार्मिक अपराध माना जाता है।

तो मुसलमान वंदे मातरम् से नफ़रत नहीं करते — वे केवल उसके पूजा वाले हिस्से को धार्मिक कारणों से नहीं कह सकते।


📜 2. संविधान क्या कहता है?

क्या "वंदे मातरम्" गाना कोई कानूनी या राष्ट्रीय बाध्यता है?

भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है, जहां हर नागरिक को विचार, अभिव्यक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है। इसी सिद्धांत के तहत, यह जरूरी है कि हम समझें:
क्या वंदे मातरम् गाना हर भारतीय नागरिक पर अनिवार्य है?

राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान में फर्क

  • भारत के पास दो राष्ट्रीय प्रतीकात्मक गीत हैं:
    1. "जन गण मन" — राष्ट्रगान (National Anthem)
    2. "वंदे मातरम्" — राष्ट्रीय गीत (National Song) 
  • हालांकि दोनों का देश की भावना में बड़ा योगदान है, लेकिन सिर्फ राष्ट्रगान को लेकर कुछ विशेष संवैधानिक प्रावधान हैं, जैसे कि स्कूलों में गाना, खड़े होकर सुनना आदि।
  • "वंदे मातरम्" को गाना संविधान या कानून द्वारा अनिवार्य नहीं किया गया है।
  • यह राष्ट्रप्रेम का एक शक्तिशाली प्रतीक है, पर किसी पर थोपे जाने वाला कर्तव्य नहीं।


⚖️ सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: Bijoe Emmanuel v. State of Kerala (1986)
(Bijoe Emmanuel & Ors. vs State of Kerala, 1986)

🔎 कोर्ट ने Article 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और Article 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) को आधार बनाकर निर्णय दिया।

मामला ये था कि तीन बच्चे  बिजॉय, वनीता और बीनी  जो Jehovah's Witness संप्रदाय से थे, केरल के एक सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। उन्होंने स्कूल की प्रार्थना सभा में राष्ट्रगान के दौरान खड़े होकर सम्मान तो दिया, लेकिन गाया नहीं, क्योंकि उनका धार्मिक विश्वास उन्हें किसी भी गीत की आराधना/उपासना से रोकता था। 
उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया।

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और कोर्ट ने कहा:

"कोई भी नागरिक अगर किसी राष्ट्रगीत या प्रतीक को धार्मिक कारणों से नहीं गाता, लेकिन उसका अपमान भी नहीं करता, तो उसे दंडित नहीं किया जा सकता।"

👉 इसका स्पष्ट अर्थ है कि:

कोई भी नागरिक, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, अगर वह शांतिपूर्वक किसी गीत से दूरी बनाए रखता है, तो वह कानूनन सही है।


🧾 संविधान क्या सिखाता है?

Article 19(1)(a) : हर नागरिक को स्वतंत्र रूप से विचार, वाणी और अभिव्यक्ति की आज़ादी है।

Article 25 : हर नागरिक को अपने धर्म के अनुसार आचरण करने और मान्यताओं को अपनाने की आज़ादी है — जब तक वो सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के खिलाफ न हो।

Article 51A (Fundamental Duties) : हालाँकि इसमें राष्ट्रगान/गीत के सम्मान की बात की गई है,  लेकिन गाने की अनिवार्यता नहीं है


सम्मान और जबरन बोलने में फर्क है — और संविधान जबरन बोलने की इजाज़त नहीं देता।

🕋 3. क्या इस्लाम देशभक्ति के खिलाफ है?

बिलकुल नहीं।

इस्लाम में "वतन" (देश), "अमन" (शांति), और "अदल" (न्याय) को बड़ा दर्जा दिया गया है।

📖 क़ुरआन कहता  है कि :

🔹"और यह कि जब तुम लोगों के बीच फैसला करो तो न्याय के साथ फैसला करो।…" 
                                                                                                               (सूरह अन-निसा: 58)

🔹"जिन लोगों ने तुम्हें तुम्हारे घरों से नहीं निकाला, उनके साथ नेकी और इंसाफ से पेश आओ, अल्लाह
        इंसाफ पसंद करता है।" (सूरह मुम्तहना: 8)


यानी अपने देश से मोहब्बत करना, उसकी रक्षा करना, और उसमें अमन बनाए रखना इस्लामी मूल्यों का हिस्सा है। 


❌ WhatsApp यूनिवर्सिटी के झूठ — और उनके जवाब

❌ झूठ 1: "जो वंदे मातरम् नहीं कहता, वो देशद्रोही है"

सच: सुप्रीम कोर्ट (1986) ने साफ कहा कि धार्मिक आधार पर कोई गीत न कहना संवैधानिक अधिकार है, जब तक राष्ट्र का अपमान न हो।

❌ झूठ 2: "मुसलमान भारत माता को नहीं मानते, इसलिए उन्हें भारत से नफ़रत है"

सच: मुसलमान भारत को अपना वतन मानते हैं, उसकी रक्षा करते हैं, लेकिन देवी के रूप में उसकी पूजा नहीं कर सकते — यह आस्था का मामला है, देशभक्ति का नहीं।

❌ झूठ 3: "मुसलमान पाकिस्तान समर्थक हैं"

सच: आज़ादी के बाद 10 करोड़ से अधिक मुसलमानों ने भारत को चुना, और तब से इसकी संस्कृति, विकास और लोकतंत्र में हिस्सेदार रहे हैं।


🧠 निष्कर्ष: देशप्रेम एक भावना है, कोई नारा नहीं

"वंदे मातरम्" एक शक्तिशाली गीत है, पर यह देशप्रेम का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता।
भारत की ताकत उसकी विविधता में है — और उस विविधता में मुसलमान भी शामिल हैं।

हर वह व्यक्ति देशभक्त है जो:

  • देश का संविधान मानता है
  • अमन और न्याय की बात करता है,
  • और इस मिट्टी से मोहब्बत करता है।


अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं। 


मुसलमान 'वंदे मातरम्' क्यों नहीं कहते ? मुसलमान 'वंदे मातरम्' क्यों नहीं कहते ? Reviewed by ---------- on October 11, 2025 Rating: 5

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